Hindi Chut Ki Chudai Ki Kahani

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महारानी अजंता और टार्ज़न 

नोट : इस कहानी के सभी पात्र एंव घटनाये! लेख़क का काल्पनीकता मात्र है। सभी पात्र 1८ वर्ष के आयू के उपर 

दर्शाये गयें हैं। इस कहानी में दर्शाये गये FAKES चीत्र, अथवा स्थान से, इस कहानी से कोई भी तालुक नही। अत: 

दर्शाये गये चीत्र मात्र मनोरंजन के लीये है। कहानी के पात्र एंव घटनाओं का वास्तवीकता से मेल, मात्र एक संयोग 

कहा जायेगा।अपडेट २ - राजकुमारी की जंगल यात्रा  अगले दिन राजकुमारी ने पूर्व कार्यक्रम के अनुसार सेनापति 

वीर सिंह के साथ सुबह ही जंगल में निकल जाने का निश्चय किया (न जाने क्यों वह यह यात्रा अपने पिता के आने से 

पूर्व करना चाहती थीं). उन्होंने वीर सिंह को यह भी कहा की वापसी में वह एक बार अपने इष्ट देवता महाकाल के 

दर्शन अवश्य करेंगी.  राजकुमारी ने जैसे ही राजमहल से बाहर अपना कदम रखा - वहां सुसीम आ गया - क्यों 

राजकुमारी कैसी हैं आप - अजंता ने घृणा और अपेक्षा की मिली जुली भावनाओ से वशीभूत होकर अपना मुख फेर 

लिया –उनकी आँखों में सुसीम को देखते ही क्रोध उतर आया, इससे पहले की राजकुमारी अजंता कुछ कहतीं, 

सुसीम ने कहा - राजकुमारी आपका इस प्रकार आदिवासियों में जाना उचित नहीं, आप महाराज को बिना बताये 

जंगल और आदिवासियों के बीच जा रही हैं महाराज को यह बात कतई पसंद नहीं आएगी - वह निम्न जाती के लोग 

हैं और राजमहल वालों का आदर नहीं करते- आपके लिए उचित होगा की आप राजमहल में न जाएं. राजकुमारी ने 

एक गहरी नज़र सुसीम पर डाली और उसके पश्चात पास ही खड़े एक घुडसवार (जो उनकी टुकड़ी में ही अंगरक्षक 

था) को आदेश दिया - उतरो  घुडसवार - परन्तु राजकुमारी आपका रथ तो सामने तैयार है  राजकुमारी - हमने 

कहा  उतरो  और इससे पहले की कोई कुछ भी समझ पाता राजकुमारी तुरंत घोड़े पर स्वर हो गयीं और उसकी लगाम 

खींची. उनके दूसरे हाथ में एक नंगी तलवार थी - राजकुमारी इस समय कुछ क्रुद्ध थीं और उनका उभरा हुआ सीना 

उठने बैठने लगा.   उनका घोडा सुसीम के इर्द गिर्द चक्कर लगाने लगा. सुसीम राजकुमारी की इस हरकत को 

चकित होकर देख रहा था. तभी राजकुमारी का हाथ लहराया और तलवार की नौक सुसीम की सर पर से होती हुई 

उसके बंधे केश खोलती चली गयी - सुसीम ने अपने केश पकड़ लिए और फिर अचानक राजकुमारी ने तलवार से 

एक और झटका दिया - सुसीम की धोती पर तलवार का वार हुआ और सुसीम को अपनी धोती खुलती नज़र आयी  

वह सिटपिटा गया.।  राजकुमारी तुरंत अपने घोड़े से उतरीं और एक गंभीर दृष्टि सुसीम पर डाली - तुम्हे कल की दी 

हुई सीख कदाचित स्मरण नहीं है. भविष्य में अगर तुमने हमारे किसी कार्य में हस्तक्षेप किया तो इसका परिणाम 

और भी भयंकर होगा. अपने सीमा से आगे मत निकलना अन्यथा जो हाल आज तुम्हारे केश का हुआ है वह तुम्हारी 

नासिका और अन्य भागों का भी हो सकता है. तुम्हे यहीं सबके सामने निर्वस्त्र कर दूँगी  सुसीम ने अपमानित दृष्टि से 

आस पास देखा और सबकी नज़रों में उपहास था - वह अपमान की पीड़ा से जल उठा.- निर्वस्त्र तो तुम्हे में करूँगा 

राजकुमारी अजंता - वह मन ही मन बोला, राजकुमारी ने घोडा वापस घुडसवार को सौंपा और अपने रथ पर सवार 

हो गयीं   आज्ञानुसार वीरसिंह ने कुछ चुने हुए सैनिको को साथ लिया और राजकुमारी के साथ जंगल की ओर 

निकल पड़े. प्रत्यक्ष में राजकुमारी ने शिकार की बात की परन्तु उन्हें कुछ कुछ यह अंदेशा हो गया था की 

राजकुमारी वहां निश्चित रूप से आखेट नहीं अपितु कुछ और ही सोच कर जा रही थीं.  कल जिस प्रकार राजकुमारी 

ने माधोपुर में अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था उस से वीर सिंह भी बहुत चकित और प्रभावित थे. एक छोटी सी 

लड़की इतनी वीर हो सकती है उन्होंने कभी सोचा नहीं था. यों तो उन्होंने ही राजकुमारी को तलवार चलाने का 

प्रशिक्षण दिया था परन्तु वह यह कल्पना भी नहीं कर सके थे की राजकुमारी थोड़े ही समय में इतनी निपुण हो 

जाएगी की वह जलाल सिंह जैसे योद्धाओं का न केवल सामना कर लेगी अपितु उसे परास्त भी कर देगी.  

राजकुमारी का रथ सबसे आगे था और साथ में अंगरक्षक अपने रथ पर पीछे और कुछ आगे घोड़ों पर स्वर थे. 

लेकिन राजकुमारी का रथ शेरो द्वारा चलित था.उनके सुन्दर चेहरे पर आज भी सूर्य के तरह चमकती आभा थी और 

एक प्राकृतिक मुस्कान भी.सेनापति वीरसिंह राजकुमारी के साथ ही उनके रथ पर सवार थे.जैसे ही स्वर्णपुर की 

सीमा पार हुई और जंगल समीप आने लगे , राजकुमारी का हृदय वहां के प्राकृतिक सौंदर्य को देख कर और भी 

प्रसन्न हो गया और वह इसका आनंद लेने लगीं. राजकुमारी को बचपन से ही जंगल में घूमना , रहना और अपना 

कुछ समय व्यतीत करना अति आनंदायक लगता था॥राजकुमारी - वीरसिंह जी यह भी स्वर्णपुर का सौभाग्य है की 

यहाँ के जंगल हमारे ही राज्य का भाग हैं और इसकी समपदा से हमे बहुत लाभ होता है.सेनापति हलके से मुस्कुराये 

आप ठीक कह रही हैं राजकुमारी परन्तु _राजकुमारी - परन्तु क्या   सेनापति - इन जंगलों से जुडी कुछ समस्याएं 

भी है   राजकुमारी - जैसे  किस प्रकार की समस्याएं ?और तभी राजकुमारी ने पाया की कुछ कच्ची सड़कें 

आरम्भ हो गयी हैं और आगे के रास्तों का स्वर्णपुर की सड़कों की भाँति न तो भली प्रकार से निर्माण हुआ था और न 

वहां के घरों में सोने की सजावट इत्यादि थी. ऐसा प्रतीत होता था मIनो वहां पर आकर प्रगति जैसे रुक गयी हो और 

जंगल के पास के यह हिस्से किसी भी प्रकार से स्वर्णपुर राज्य का भाग नहीं लग रहे थे.राजकुमारी - सेनापतीजी क्या 

यह हमारे राज्य में नहीं आते  सेनापति - नहीं राजकुमारीजी यह जंगल और पास के इलाके हमारे राज्य के ही हैं 

और स्वर्णपुर के अंतर्गत ही माने जाते हैं. और साथ ही उन्होंने सारथि को निर्देश दिया - आगे रथ थोड़ी धीमी गति से 

चलना.यह सुनकर राजकुमारी अजंता ने प्रश्नसूचक दृष्टि से सेनापति वीरसिंह की ओर देखा   प्रश्न की प्रतीक्षा किये 

बिना सेनापति कह उठे - आगे कुछ और कच्चे रास्ती और एक सेतु है जिसका निर्माण कई वर्ष पूर्व हुआ था और जो 

बहुत अच्छी अवस्था में नहीं है  राजकुमारी - ऐसा क्यों सेनापति जी - इसका उतर दायित्व किसका है और इसका 

पुनर निर्माण क्यों नहीं किया गया. हमारे राज्य के सम्बंधित विभाग से इस विषय में _और तभी राजकुमारी अजंता ने 

यह भी देखा की पगडण्डी शुरू होते ही उसके दोनों ओर स्वर्णपुर के सैनिक वहां पर पहरा दे रहे थे - राजकुमारी 

का रथ गुज़रते ही सबने उनकी जय जयकार करनी प्रारम्भ कर दी और अपने सर झुका दिए    राजकुमारी ने हाथ 

ऊपर उठा कर और कुछ मुस्कुराकर सबका अभिवादन किया परन्तु अंदर से वह बहुत चकित थीं.उन्होंने सेनापति 

की ओर देख कर कहा - क्या कारण है की इस स्थान पर हमारे बहुत से सैनिक तैनात हैं   सेनापति - राजकुमारीजी 

वास्तव में यहाँ से जंगल का क्षेत्र प्रारम्भ हो गया है और यहाँ पर हमे कड़ी सुरक्षा रखनी पड़ती है   राजकुमारी - ऐसा 

क्यों - यह तो हमारा ही राज्य है फिर क्यों  ऐसा हो रहा है.राजकुमारी की निगाहें दोनो ओर घूम रही थीं.एक जगह 

तो इतना मनोरम दृश्या था की राजकुमारी मंत्रमुग्ध हो गयीं – एक ऐसी गहरी शांत झील जिस पर अनंत आकाश की 

नीलभ छाया निरंतर तैर रही थी.यह अपार सौंदर्य का अप्रतिम रूप था. वास्तव में पहाड़ी के एक ओर से नदी अबोध 

रूप से बहती हुई एक चट्टान से टकराकर बाल खाकर मुड़ गयी थी और लंबी चौड़ी झील में संचित हो गयी थी. फिर 

उन्होने पगडंडी के आस पास की भारी भरकम चट्टाने , जंगल घास और घने पेधों की ओर ध्यान से देखते हुए 

सेनापति पर रुख़ किया और अपनी उंगलियों से माथे पर छा गये घने काले और पीछे से खुले बालों को ठीक करने 

लगीं.सेनापति वीरसिंह – दरअसल यहाँ के आदिवासियों के साथ हमारी कुछ समस्याएं हैं.राजकुमारी – कैसी 

समस्याएं?सेनापति – इन आदिवासियों का कहना है के यह वॅन जिससे की स्वर्णपुर को अच्छी आय होती है और जो 

की स्वर्णपुर की सुरक्षा का कारण भी हो सकते हैं उनपर हमारा राज्य बिल्कुल ध्यान नही देता. यह आदिवासी कहते 

हैं की सैनिकों को उन पर पहरा करने के लिए तो तैनात कर दिया जाता है परंतु उनकी रक्षा करने के लिए स्वर्णपुर 

से उन्हे कोई सैन्य सहायता नही दी जाती और जब यह अपनी सुरक्षा स्वयं करते हैं तो इन्हे आतंक फैलने के लिए 

बदनाम किया जाता है. कई बार इन्हे अनेक बीमारियों का भी शिकार होना पड़ता है परंतु राज्य इन पर कोई ध्यान 

नही देता. और तो और रुद्रपुर के सैनिक भी कभी कभी यहाँ आक्रमण करके वन संपदा को नष्ट करते हैं परंतु इन 

आदिवासियों को स्वर्णपुर राज्य से कोई सरंक्षण या सहायता प्राप्त नही होती.राजकुमारी पूरी बात बहुत ध्यान से सुन 

रही थी . उन्होंने सेनापति की बात बीच में कIटी और कहा - पर वीरसिंह जी इन तथ्यों पर कौन ध्यान देगा? क्या 

आपने कभी महाराज से इन सबके बारे में विचार विमर्श नहीं किया   सेनापति - राजकुमारीजी न केवल में अपितु 

महामंत्री भी महाराज से इस विषय पर चर्चा कर चुके हैं. एक बार तो इन आदिवासियों के कहें पर हम इनके सरदार 

की महाराज से भेंट भी करवा चुके हैं. परन्तु महाराज इन सबसे कुछ प्रसन्न नहीं लगते और उन्होंने इन विषयों पर 

अधिक ध्यान नहीं दिया. वह इन आदिवासियों से प्रसन्न नहीं हैं और इनके सरदार को स्वर्णपुर में आने का अनुमति 

पत्र भी प्रदान नहीं किया. इसका परिणाम यह है की भले ही यह हमे जंगल में आने से रोक न पाएं परन्तु हमारे 

सम्बन्ध इनसे बहुत अच्छे नहीं हैं. महाराज का विचार है की रुद्रपुर के सैनिक और आदिवासी साथ साथ मिलें हैं 

जिसके कारण हमे अपनी सुरक्षा यहाँ बढ़ानी पड़ रही है।राजकुमारी - यहाँ भी रुद्रपुर का वर्णन आ गया  सेनापति- 

हाँ क्योंकि रुद्रपुर की सीमा का एक भाग भी इन जंगलों से मिलता है. इतना ही नहीं राजकुमारीजी वहां पर एक 

डाकुओं का गिरोह भी सक्रीय है जो कई बार माधोपुर और इन जंगलों में लूट पाट मचा चुका है.राजकुमारी - पर 

महाराज इस विषय में चर्चा करके भी आप लोग  सेनापति - क्षमा करें राजकुमारी में इस विषय में अधिक नहीं कह 

पाउँगा. उनके सलाहकार महामंत्री के अलावा महा माया देवी और राज्य मंत्री शैतान सिंह भी हैं.अभी तक तो वित्त 

विभाग स्वयं महाराज देख रहे हैं. परन्तु राज्य मंत्री चाहते हैं की यह विभाग उनके नियंत्रण में हो.राजकुमारी को कुछ 

कुछ समझ आने लगा की महाराज को गलत सलाह देने वालों का प्रभाव उन पर अधिक है , उनके स्वामिभक्तों की 

अपेक्षा. परन्तु उस समय उन्होंने खामोश रहना ही उपयुक्त समझा.पर वह सोच में डूब गयी  तभी राजकुमारी का 

काफिला जंगल के और अंदर चला गया जहाँ उन्हें आदिवासिओं के छोटे छोटे कच्चे घर और कुटियाँ नज़र आने 

लगी. वहां के आदिवासी भी इधर उधर अपने कामों से घूम रहे था. सबने मुड़कर राजकुमारी का रथ देखा और 

उनमे से कुछ ने सर झुक कर अभिवादन भी किया परन्तु राजकुमारी ने भांप लिया की आदिवासी को उनके आने 

पर कोई प्रसन्नता नहीं हुई. इतने में एक विशाल पेड़ नज़र आया जिस की शाखाओं पर एक झौंपड़ी नुमा घर बना 

था. उसके नीचे एक लकड़ी की सीढ़ी थी जिस से आसानी से उसपर चढ़ा जा सकता था.  ठीक उसके नीचे कुछ 

आदिवासी भIला और तीर कमान लिए पहरा दे रहे थे. उन पहरेदारों के हाथों में भाले थे और शरीर के ऊपरी भाग 

नग्न थे. सिर्फ गुप्तांग के पास या तो घास फूस या चीते की खाल से बने के कुछ आवरण थे जो वस्त्रों का काम कर रहे 

थे.।जैसे ही राजकुमारी का रथ आकर रुका , कुछ पहरे दार चौकन्ने ही गए. तब राजकुमारी का एक सन्देश वाहक 

रथ से उतरा और आगे चल कर उन पहरेदारों के पास गया - राजकुमारी अजंता पधारी हैं - आप अपने सरदार से 

कहें की वह उनसे भेंट करना चाहती हैं    एक पहरेदार ने दुसरे को इशारा किया तो वह ऊपर जाकर लौट आया - 

जिन्गाला महाराज अभी पूजा में वयस्त हैं. राजकुमारी की प्रतीक्षा करनी होगी  संदेशवाहक - तुम्हारा साहस कैसे 

हुआ इस तरह बात करने का . उनसे कहो की यह राजकुमारी का आदेश  तभी राजकुमारी अजंता की आवाज़ ज़ोर 

से आयी - ठहरो संदेशवाहक - अगर सरदार पूजा में व्यस्त हैं तो कोई बात नहीं - हम प्रतीक्षा करेंगे.  वहां के कई 

आदिवासी राजकुमारी को देख कर हैरान थे - उन्होंने आज तक इतनी सुन्दर और इतनी प्यारी सी दिखने वाली 

लड़की शायद नहीं देखि थी - वह आपस में फुसफुसाने लगे - यह लड़की यहाँ क्यों आयी है  दुसरे ने कहा - यह 

कोई साधारण लड़की नहीं यहाँ की राजकुमारी है  पहले - बहुत सुन्दर है - और क्या राजशी वैभव भी - मैंने आज 

तक इतनी सुन्दर लड़की पहले नहीं देखी  तीसरा - देखोगे कैसे - राजमहल से यहाँ तो पहले कोई आया ही नहीं - 

वैसे इसका नाम क्या   दूसरा - पता नहीं - मुझे तो यहाँ के महाराज का भी नाम नहीं पता. एक अन्य आदिवासी - यह 

राज महल के लोग पता नहीं स्वयं को क्या समझते हैं - कभी यहाँ पर आकर नहीं देखा की जंगल में हम कैसे रहते 

है और क्या क्या हालत है  काफी देर प्रतीक्षा के बाद एक रॉब दार विशालकIय दिखने वाला आदमी जिसके चेहरे 

पर बकरे जैसी दाढ़ी और सर पर आदमजात हड्डियों से बना मुकुट था और जिसके शरीर पर चीते की खाल से बने 

वस्त्र थे, नीचे उतरा.वह उन आदिवासियों का सरदार था और सब उसके आते ही नत मस्तक हो गए. एक ने नारा 

लगाया - जिन्गाला महाराज की जय  जिन्गाला ने सबको हाथ हिलाकर सम्भोधित किया - आज हमारी ने नहीं 

स्वर्णपुर की राजकुमारी की जय जय कार करें. आज राजमहल वाले यहाँ पर रास्ता भूल गए हैं  राजकुमारी को 

आदिवासी सरदार के लहजे और व्यहवार में व्यंग्य साफ़ साफ़ दिख रहा था - परन्तु फिर भी उसने दोनों हाथ जोड़ 

कर कहा - जिन्गाला महाराज को राजकुमारी अजंता का प्रणाम.प्रत्युत्तर में जिन्गाला महाराज ने भी वही किया और 

कहा - आईये राजकुमारी विराजमान हों.राजकुमारी और जिन्गाला महाराजा आमने सामने बैठ गए और उन दोनों 

के अंग रक्षक उनके आस पास खड़े हो गए   तभी राजकुमारी ने पुरज़ोर स्वर में कहा - एकांत  राजकुमारी के 

अंगरक्षक चकित हो उनकी ओर देखने लगे - परन्तु राजकुमारीजी आप   राजकुमारी - हमने कहा एकांत अर्थात 

एकांत  सब अंगरक्षक कुछ दूर जाकर खड़े हो गए  वह जिन्गाला के आदमियों की ओर देखने लगी . सरदार ने उन्हें 

भी इशारे से दूर जाने को कहा.उनके जाते ही राजकुमारी ने सरदार जिन्गाला महाराज की ओर अपना रुख किया - 

सरदार हमे ज्ञात हुआ है की यह जंगल स्वर्णपुर की सीमा में ही आते हैं ओर   जिन्गाला - बहुत जल्दी ज्ञात हो गया 

राजकुमारी. अपने आने का वास्तविक कारण हमे बताइये.राजकुमारी - हमारे आने का यहाँ एक मुख्य उद्देश्य यह 

है की हम आपकी समस्याओं को जानना चाहते हैं . हमे ज्ञात हुआ है की जंगल जो की हमारी मुख्या सम्पदा हैं , 

उसमे डाकुओं की घुसपैठ, लूट पाट, चन्दन की लकड़ी का चोरी होना ओर जीव जंतुओं की शिकार के अलावा 

बिना कारण हत्या ओर उनकी खाल का गैरकानूनी तरीके से बाहर भेजा जाना , कई प्रकार के अवैध कार्य  सरदार  

हमारी समस्याओं का कोई अंत नहीं राजकुमारी परन्तु राजमहल को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं . 

राजमहल के प्रतिनधि यहाँ आकर कभी हमारी कठिनाईओं और हालत तथा बिमारियों पर कभी अपना ध्यान 

केंद्रित करते हैं - हाँ यदि कर समय पर न पहुंचे तो आपके सैनिक यहाँ आकर आपने आक्रोश दिखते हैं और हमसे 

कर वसूलते हैं. परन्तु में यह सब आपको क्यों बता रहा हूँ - आप राज महल से है और यहाँ की राजकुमारी - आपके 

पिता महाराज विक्रम प्रताप को हमसे घृणा है और हमे उनसे - आपके लिए उचित होगा की आप यहाँ से बिना एक 

पल भी व्यर्थ किये वापस राजमहल लौट जाएं अन्यथा  राजकुमारी - अन्यथा   सरदार - हमारी सहन शीलता की 

परीक्षा न लें राजकुमारी - आप अभी बिलकुल बच्ची हैं और कुछ भी नहीं समझतीं. सरदार जिन्गाला महाराज बहुत 

देर तक राजकुमारी को जंगल के हालात से अवगत कराते रहे परन्तु उनके स्वर में रोष एवं कटुता थी - वह 

राजकुमारी से बहुत ही अधिक रुष्ट होकर बात कर रहे थे - और उन्होंने बिना किसी डर के महाराज और उनके 

कई अधिकारीयों और मंत्रियों की खुलकर बुराई की.राजकुमारी चुप चाप धैर्य पूर्वक सारी बात सुनती रही. उन्होंने 

सरदार के बोलते समय एक शब्द भी न कहा.अंत में सरदार ने कहा - हम एक ही इष्ट देवता को पूजते हैं 

राजकुमारी - मेरी आपसे यही विनती है की आप लौटते समय महाकाल को प्रणाम करें और फिर से यहाँ आकर 

अपना समय व्यर्थ न करें राजकुमारी - हम आपका पहला कथन अवश्य मानेंगे सरदार. परन्तु रही बात यहाँ न लौट 

कर आने की तो - कुछ प्रतीक्षा करें - मैं राजकुमारी अजंता आपको वचन देती हूँ की एक दिन ऐसा आएगा जब आप 

सब लोग मुस्कुरा कर यहाँ मेरा अभिवादन करेंगे - आपको प्रणाम - जय महाकाल और राजकुमारी ने आपने रथ पर 

बैठ कर वापसी का रुख लिया सेनापति - मैंने आपसे पहले ही कहा था राजकुमारी - आप व्यर्थ ही यहाँ पर आयीं 

और अपना समय  राजकुमारी ने बिना उनकी ओर देखे कहा - वीर सिंह जी आप हमे वचन देंगे  सेनापति - क्या  

राजकुमारी - कल अगर स्वर्णपुर राज्य ओर प्रजा के हित एवं सुरक्षा को लेकर यदि में कोई कदम उठाना चाहूँ तो 

आप मेरा साथ देंगे? सेनापति कुछ देर सोचते रहे - फिर एक मद्धिम स्वर में बोले - हाँ राजकुमारी.राजकुमारी - बस 

वीरसिंह जी आप हमे दिए इस वचन पर कायम रहिएगा  वीरसिंह ने प्रश्नसूचक दृष्टि से राजकुमारी को देखा परन्तु 

वह उनकी बात का अर्थ न समझ पाए. वैसे भी राजकुमारी सामने की दिशा में देख रही थीं.पर वीरसिंह ने गौर किया 

की राजकुमारी मंद मंद मुस्कुरा रही थीं ओर आदिवासियों के किये गए बर्ताव से भी वह अप्रसन्न और तनावग्रस्त 

नहीं लग रही थीं.कुछ समय बाद राजकुमारी ने ही चुप्पी तोड़ी - वीरसिंह जी अब हम महाकाल के मंदिर जा रहे हैं  

वीरसिंह ने सहमति में सर हिलाया - राजकुमारी कहती गयी - मुख्य मंत्री धर्मदेव सिंह जी भी आ रहे हैं  वीरसिंह ने 

सोचा शायद राजकुमारी उनसे पूछ रही हैं - नहीं ऐसा तो कोई कार्यक्रम नहीं बना था  राजकुमारीजी - आप चिंतित 

न हो, मैंने उन्हें आने के लिए कह दिया था.वीरसिंह चकित होकर राजकुमारी की ओर देखने लगे.राजकुमारी जैसे 

ही महाकाल के मंदिर पहुंची वहां पर कुछ सेवक ओर दासियाँ उनका अभिवादन करने आगे आ गए ओर कुछ 

दासियों ने उनके हाथ थामकर उन्हें रथ से उतारा  राजकुमारी ने मुख लहराकर दूसरी ओर किया तो उनके केश भी 

लहरा उठे ओर उनका आधा चेहरा ढक लिया - ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो एक छोटा सा गोल चाँद धरती पर उतर 

आया हो. गौरे गुलाबी मुखड़े को घने काले केशों ने समेटा था. मृग नयन से आँखें चंचलता से मुस्कुरा रही थीं. रस 

भरे होंठ गुलाब की पंखुरियों से नाजुक थे. लाल ओर सुनहरे रंगो एवं सुनहरी कड़ाई से सुस्सजित राजकुमारी की 

चोली ओर लहंगा उनके सौंदर्य को तो बढ़ा ही रहे थे, साथ में उनकी चांदी की जूती में सोने के तारों का जाल लगा था 

ओर सोने के घुँघरू भी थे जो हर उठते कदम पर बज उठते थे. एक तराशी हुई मूरत की तरह असीम सौंदर्य को 

समेटे हुए राजकुमारी सबको आकर्षित कर रही थी. पूजा से पहले स्नान के तैयारी हुई. खुद वीरसिंह को यह ज्ञात 

नहीं था की राजकुमारी ने मुख्यमंत्री से कहकर एक विशाल पूजा का आयोजित किया था - इसी लिए पूजा से पहले 

स्नान की तैयारी भी थी.।एक सरोवर जो विशेष कर राजकुमारी के लिए ही बनाया गया था. सरोवर के पास जाकर 

एक कक्ष में कुछ परिचारिकाएं तो उनके वस्त्र ओर आभूषण उतरवाने में लग गयीं औऱ कुछ ने उनके कुंदन जैसे 

शरीर पर चन्दन औऱ दूध का उबटन मलना शुरू कर दिया.जल में इत्र औऱ गुलाब जल छिरका गया. सरोवर में 

प्रवेश होने से पहले राजकुमारी अजंता ने अपने सब वस्त्र उतार दिए  राजकुमारी की कुंदन जैसी काया पर एक 

गुलाबी रंग की छोटी सी चोली और नीचे एक कच्छी थी। नहाने से पूर्व राजकुमारी ने उन वस्त्रों को भी उतार दिया 

और सम्पूर्ण रूप से नग्न होकर जल में कूद गयी और अपने कुंदन जैसी सुन्दर काया को सरोवर के शीतल जल के 

हवाले कर दिया.ऐसा करते समय उनके गुलाब जैसे चेहरे पर एक बड़ी ही चंचल मुस्कान थी.उभरते वक्षस्थल 

गदरायी कमर और अजंता की मूरत सा खिलता शरीर - राजकुमारी अपने सौंदर्य को देख कर कुछ स्वयं पर मोहित 

हो रही थीं. स्नान के पश्चात उन्होंने सुनहरे और बेशकीमती नीले रंग के वस्त्र जिसमे सुनहरी कड़ाई की चोली और 

लहंगा था उसका चयन किया और कक्ष में जाकर तैयार होने लगी। लहंगा पहनते समय उन्होंने एक दृष्टि अपने 

उभरते हुए वक्षस्थल पर डाली और वह लज्जा गयीं। फिर चोली और आभूषण धारण करने में दासियों ने सहायत की 

और उन्हें तैयार किया। स्नान के बाद राजकुमारी एक विशाल कक्ष में पहुंची जहाँ महाकाल की एक असाधारण 

प्रतिमा विद्यमान थी औऱ आस पास छोटी बड़ी कई प्रकार की मूर्तियां थीं. संगीत के हलके सुर से पूजा कि प्रारम्भ 

हुआ. इस समय कक्ष में केवल राजकुमारी ही थी. राजकुमारी ने दोनों हाथ ऊपर उठाकर जोड़े और कुछ देर एक 

ही पैर पर खड़े होकर महाकाल की आराधना की लगभग घंटे तक पूजा करने के बाद राजकुमारी ने उच्च स्वर में 

कहा - हे महाकाल मुझे अपना आशीर्वाद देकर मेरा आगमन मनगलमय करें.ऐसे होने के कुछ देर पश्चात ही एक 

ज़ोरदार आवाज़ गूँज उठी - राजकुमारी अजंता - हम तुम्हारी भक्ति भावना से प्रसन्न हैं . बोलो क्या कहना चाहती 

हो.अजंता - हे महाकाल मैं अपने आस पास भविष्य में कुछ संकट आने का चिन्ह देख रही हूँ, बहुत सारे कार्य जोकि 

स्वर्ण पुर के हित में होने चाहिए थे वह नहीं हो रहे. महाकाल - राजकुमारी अजंता - तुम अपने भक्ति भाव और 

स्वर्णपुर को आगे लेजाने की लगन में पूर्ण रूप से अपनी तन्मयता से कार्य करो और मॉस में एक बार यहाँ आकर 

एक यज्ञ करो. महाकाल तुम्हे सफल होने का आशीर्वाद देते हैं. तुम्हारी राह कठिन हैं पर यदि तुम वीरता पूर्वक 

सभी चुनौतियों का सामना करोगी तो निश्चय ही सफलता पाओगी. इसके पश्चात राजकुमारी राजमहल की ओर 

अपने रथ में प्रस्थान कर दी. अभी जंगल का रास्ता पार भी नहीं हुआ था की सहसा राजकुमारी की दृष्टि एक पेड़ के 

पास एक मरे हुए जानवर पर पड़ी.रथ रोको - राजकुमारी ने आदेश दिया.वह रथ से उतरी ओर दो सैनिकों के साथ 

उसके समीप जाकर देखा. राजकुमारी अजंता ने पाया एक काले रंग की विभिन्न नस्ल की शेरनी मृत पड़ी थी. तभी 

उससे बिलकुल हलके से गुर्राने की आवाज़ आयी  सबने देखा की बगल में ही एक बहुत छोटा सा काला परन्तु बहुत 

प्यारा उस शेरनी का बच्चा उसके पैरों से लिपटा हुआ थाराजकुमारी को वह दृश्य बहुत ही करुणामयी लगा ओर 

उसने उस शेर के बच्चे को उठा लिया. तभी राजकुमारी ने देखा की शेरनी के मृत शरीर के पास कुछ दूध बिखरा है 

और खून भी। वह शेर का बच्चा कृन्दन कर रहा था और कदाचित भूख से वयाकुल था। राजमकुमारी ने एक दासी 

को आवाज़ लगायी और रथ में से एक सुनहरी पात्र से कुछ दूध लाने को कहा और सब सैनिको को कुछ पल रूकने 

का आदेश दिया। वह उस शेर के बच्चे को एक कोने में ले गयीं अपनी बांह में समेटकर। बच्चा बही भी रो रह था 

और दूध को बड़ी कठिनाई से पी रहा था। राजकुमारी ने इधर उधर देखा और एक छोटी सी नली पकड़ ली जिससे 

वह उस पात्र जो की एक छोटी सी से सुनहरी बोतल की भाँती था उसे उठा लिया। इस पूर्व राजकुमारी ने अपनी 

चोली उतार कर एक ओर रख दी और उस बोतल को अपने वक्षो में छुपा लिया ओर उस शेर के बच्चे को गोद में 

लिटाकर वह बोतल उस नाली से लगा दी। ढेर के बच्चे ने ऑंखें बंद करके चुप चाप दूध पीना आरम्भ कर दिया।

ऐसा प्रतीत हो रह था मIनो कोई कन्या अपना दूध ही शेर के बच्चे को पिला रही हो।शेर का बच्चा कुछ शांत हुआ ।

राजकुमारी ने चोली पहनी ओर झाड़ियों के झुरमुट से बाहर आ गयी।चलो राजमहल - राजकुमारी ने आदेश दिया 

ओर पहुँचते ही उस शेर के बच्चे को एक सुरक्षित पिंजरे में रखवा दिया यह आदेश देकर की इसका पूरा ध्यान रखा 

जाये.तभी एक परिचारिका ने आकर सूचना दी - राजकुमारी महाराज आ गए हैं ओर वह आपसे शीघ्र ही मिलना 

चाहते हैं - उन्होंने आपको अपने कक्ष में भेजने के लिया कहा है राजकुमारी - ठीक है उनसे कहो में आ रही हूँ 

महाराज के कक्ष में घुसते ही राजकुमारी ने मुस्कुराकर उनका अभिवादन किया - प्रणाम पिताजी. आशा करती हूँ 

की आपकी यात्रा सफल रही होगी आशा के विपरीत महाराज का एक बहुत ही रूखा सा उत्तर आया - प्रणाम फिर 

वह कुछ सख्त होकर बोले - सुना है आजकल तुम बहुत से निर्णय स्वयं ही लेने लगी हो.राजकुमारी - में आपका 

तात्पर्य समझी नहीं पिताजी महाराज विक्रम सिंह ने राजकुमारी की माधोपुर यात्रा और जंगल में आदिवासियों से भेंट 

का वर्णन किया - उनके स्वर में अप्रसन्नता साफ़ झलक रही थी.राजकुमारी - पिताजी आपके इस राज्य का 

उत्तराधिकारी कौन है महाराज ने ठन्डे ओर रूखे स्वर में उत्तर दिया - तुम - पर यह प्रशन्न क्यों ?राजकुमारी - तो 

क्या यह मेरा कर्त्तव्य नहीं की में अपने राज्य ओर उसके आसा पास के हालत ओर समस्याओं को समझू और अपनी 

प्रजा को जानू.महाराज - तो तुम अब हमे सिखाओगी की तुम्हे खुद को कैसे चलना है ओर   राजकुमारी - मेरा अर्थ 

यह नहीं   महाराज ने बीच में ही बात काट दी - इन आदिवासियों के पास जाने का कोई लाभ नहीं और माधोपुर के 

लोगों को क्या तुम जानती नहीं - भूल गयी की उस विदेशी का क्या हुआ था  राजकुमारी के मासूम चेहरे पर 

अचानक ही बहुत दर्द भरे भाव उत्पन्न हो गए ओर वह पलट कर चल दी - नहीं भूल सकती - कभी नहीं भूल सकती 

ओर वह उदास होकर अपने कक्ष में प्रविष्ट हो गयी. राजकुमारी एक दम ही बहुत थकी और उदास नज़र आने लगी 

 जॉन मेरे प्रिय बाल सखा - मेरे सबसे प्रिय मित्र - पता नहीं तुम कहाँ होंगे. तुम जीवित भी हो या नहीं  वह विचारों में 

खोयी थी और कुछ याद करके राजकुमारी की आँखों में आंसू आ गए ओर वह हिचकियाँ लेकर रोने लगी.वह बहुत 

देर तक रोती रही ओर फिर उसके पश्चात बिना भोजन किया ही सो गयी  सुबह जब वह उठीं तो मन कुछ हलक था 

वह तैयार होकर उस पिंजरे के पास पहुंची जहाँ वह शेर का बच्चा मौजूद था. पिंजरा खुलवाकर वह एक दासी के 

साथ अंदर प्रविष्ट हुईं ओर प्यार से उस बच्चे को उठा लिया वह जोश भरे स्वर में बोली . यह शेर आज से मेरा सबसे 

प्रिय मित्र ओर साथी है जो हर कदम पर मेरा साथ देगा. और इसका नाम होगा - खूंखार


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